एजुकेशन बिजनेस के सच को दिखाती है 'चॉक एंड डस्टर'
व्यापारियों के कंधो पर टिके आज के वर्तमान स्कूल शिक्षा व्यवस्था पर आधारित ''चॉक एंड डस्टर''....
130 मिनट की फिल्म 'चॉक एंड डस्टर' ऐसी कहानी पर आधारित है जो आज के एजुकेशन सिस्टम पर सवाल उठाता है। फिल्म में दिखाया गया है कि क्या बड़ी-बड़ी बिल्डिंग पर खड़ी इमारते ही नंबर 1 स्कूल का खिताब जीत सकती है। या एक ऐसे टीचर्स से भरा स्टाफ रूम जिसके लिए बच्चे केवल स्टूडेंट ही नहीं बल्कि उनके लिए वो गिली मिट्टी होते हैं जिसे निखार कर वह आईआईटी और एम्स जैसे विश्वविद्यालयों के लिए तैयार करते हैं।
भले ही वर्तमान समय में हम उन सभी टीचर्स को भूल जाते है, जिन्होनें हमें ABCD.. और 1234.. की गिनती सिखाई है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए की बड़ी इमारतें और अच्छे इंस्फ्रास्ट्रक्चर ही अच्छे स्कूल की परिभाषा हैं।
डायरेक्टर जयंत गिलतर की शानदार निर्देशन और शबाना आजमी के बेहतरीन एक्टिंग से सजी इस फिल्म को देखने भले ही पूरे थिएटर में 5 या 6 लोग हो, लेकिन मैं जो इस हॉल में बैठी 7वीं सदस्य हूं। यह दावे से कह सकती हूं, कि यह वह 6 लोग हैं जिन्हें अच्छे फिल्मों की पहचान है।
मिर्च-मसाले और फैंटेसी फिल्मों से हट कर बनी इस फिल्म की कहानी ऐसे स्कूल की है, जहां की बागडोर एक ऐसे युवा और नासमझ प्रिंसिपल के हाथों आ जाती है जो एजुकेशन को बिजनेस का रूप देने के लिए स्कूल की काबिल टीचर विद्या (शबाना आजमी) को निकाल देता है। वहीं फिल्म की को-एक्टर जूही चावला ने अपने दमदार एक्टिंग से फिल्म में जान डाल दी है। दोनों ही सीनियर कलाकारों की जुगलबंदी ने फिल्म को खास बनाया है। साथ ही निगेटिव किरदार में दिव्या दत्ता भी अपने कैरेक्टर के साथ न्याय करती नजर आई हैं।
ओवरऑल फिल्म छोटी और अच्छी कहानी पर आधारित अच्छे कंटेंट और डायलॉग्स के साथ पर्दे पर उतारी गई है। हां अंत में बस इतना की अगर आप इस फिल्म को देखने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो अपने बच्चे को साथ ले जाना ना भूलें। क्योंकि इस फिल्म से वह ऐसी बातें सीख सकता हैं जो उसे 400 पन्नों के बुक में नहीं मिलेगी। आगे मर्जी और समय आपका है।

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